पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे, TMC नेता ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम: अभिमन्यु गुलाटी
मित्रों,
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सुनामी और ममता बनर्जी की पार्टी TMC का सत्ता से बेदखल होना, देश की बाकी अन्य सभी पार्टियों के लिए सबक है कि देश का बहुसंख्यक हिन्दू समाज अंधा नहीं है, यदि आप तुष्टीकरण की राजनीति करोगे तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इसका फ़ायदा उठायेगी ही उठायेगी। और उठाए भी क्यूं न ?
कल बंगाल के मतदाताओं ने देश की तमाम बाकी राजनीतिक पार्टियों को स्पष्ट संदेश दे दिया कि यदि जीतना है तो निष्पक्षता का ड्रामा करके एक पक्ष के प्रति ज़्यादा वफ़ादार होने से काम नहीं चलेगा, आपको बाकायदा पक्षपाती होकर देश के 80% बहुसंख्यक हिन्दू समाज के साथ खड़े होना ही पड़ेगा।
फिर यही 80% हिन्दू समाज, 20% का भी खयाल रखेगा, उन्हें किसी चीज़ की तकलीफ़ नहीं होने देगा।
लेकिन आप 20% को ही सब कुछ मानकर राजनीति करेंगे तो ये 80% आपको तकलीफ़ देने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाएगा। कल के बंगाल चुनाव के नतीजे तो शायद इसी और इशारा करते हैं।
"डेमोक्रेसी तो डेमोग्राफी से ही चलती है"!
"बंगाल में केवल सत्ता परिवर्तन, भाजपा की प्रचंड जीत या TMC की हार की दृष्टि से न देखकर यह समझना होगा कि पूर्वी भारत (East India) को बचा लिया बंगाल के हिन्दुओं ने"।
हमें यह समझना होगा कि ... एक टर्म, मात्र एक टर्म और यदि ममता बनर्जी की TMC और रह जाती तो बंगाल की स्थिति कश्मीर से भी ज़्यादा भयावह होती। अंत भला तो सब भला !
बहुसंख्यक हिन्दू समाज में चेतना:
मित्रों, मेरा मानना है कि देश की बहुसंख्यक 80% हिन्दू आबादी अब अपनी राजनीतिक ताकत को लेकर सजग है और वह मुस्लिम 'तुष्टीकरण' (appeasement) की राजनीति को कतई स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
निष्पक्षता बनाम पक्षपात:
देश के तमाम विपक्षी दलों को केवल निष्पक्ष होने, सेक्यूलर होने का दिखावा करने के बजाय बहुसंख्यक हिन्दू समाज की आकांक्षाओं के साथ मजबूती से खड़ा होना होगा, तभी वे राजनीतिक ज़मीन वापस पा सकते हैं।
बंगाल का संदर्भ:
मैं इस बार के पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों और वहां की परिस्थितियों को राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़कर देखता हूं।
मेरी अपनी समझ के अनुसार, वहां का राजनीतिक बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत रक्षा जैसा है।
लोकतंत्र और संख्याबल:
"डेमोक्रेसी तो डेमोग्राफी से ही चलती है"—चुनाव अंततः संख्याओं का खेल है और जो इन संख्याओं (जनता) की भावनाओं को बेहतर समझेगा, वही टिकेगा।
निश्चित रूप से, "जय श्री राम" का नारा अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है।