मित्रों, आज जब मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े हिस्से की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, तब खोजी पत्रकारिता की मशाल को थामे रखना किसी बड़े साहस से कम नहीं है। अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की महिला पत्रकार ऋतिका चोपड़ा ने हाल ही में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर जो साहसिक स्टोरी की है, वह देश के सजग नागरिकों के लिए एक आंखें खोलने वाली रिपोर्ट है। ऋतिका चोपड़ा के इस जज्बे को देश का हर वो नागरिक सलाम करना चाहेगा जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है। ऋतिका ने अपनी रिपोर्ट में उन तथ्यों और तौर-तरीकों को उजागर किया है, जो अब तक चर्चाओं से दूर रखे जा रहे थे। उनकी स्टोरी से यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या संवैधानिक संस्थाएं सत्ताधारी दल के अनुकूल काम कर रही हैं ? आरोपों के घेरे में आई यह कार्यप्रणाली दर्शाती है कि निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाला आयोग कैसे अपनी स्वायत्तता खोता जा रहा है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने भी इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्टोरी को अपने मुख्य पृष्ठ (Front Page) पर जगह देकर यह साबित किय...
मित्रों, दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर, जो कभी ग्रहों की गति और समय के चक्र को मापने के लिए वैज्ञानिक सटीकता का प्रतीक बना था, आज देश की राजनीतिक दिशा और दशा का थर्मामीटर बन चुका है। हाल ही में देशभर से एकत्रित हुए हजारों युवाओं, विभिन्न विचारधाराओं के विचारकों और जननेताओं के महासंगम ने एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है। इस अभूतपूर्व एकजुटता ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग भले ही अपनी मर्जी से नीतियां चला रहे हों, लेकिन समय और जनता के इरादों का चक्र अब मोदी सरकार के पक्ष में नहीं घूम रहा है। 1. वैज्ञानिक प्रतीक और राजनीतिक यथार्थ जंतर-मंतर की वेधशाला (Observatory) हमें सिखाती है कि प्रकृति में कुछ भी स्थायी नहीं है—समय बदलता है और ग्रहों की चाल भी बदलती है। आज इस ऐतिहासिक स्थल से उठी आवाज इस बात का साक्ष्य है कि राजनीतिक बदलाव की बयार चल पड़ी है। जब देश की युवा शक्ति सड़कों पर उतरती है, तो वह केवल विरोध नहीं करती, बल्कि सत्ता के अहंकार को चुनौती देकर समय का रुख बदलने का माद्दा रखती है। 2. तानाशाही रवैये और मनमानियों के खिलाफ एकजुटता लोकतंत्र संवा...