राजनीति में सक्रिय होना एक बात है, लेकिन राजनीतिक चेतना और सामाजिक सरोकारों के प्रति ईमानदार रहना बिल्कुल दूसरी बात है। आज जब मैं अपने बीते तीन दशकों के सार्वजनिक और सामाजिक जीवन को देखता हूँ, तो मुझे अपने निर्णयों पर कोई पछतावा नहीं होता, बल्कि इस बात का संतोष होता है कि मैंने कभी अपनी अंतरात्मा और जनसेवा के मूल्यों से समझौता नहीं किया। मेरी राजनीतिक यात्रा जनवरी 1994 में शिवसेना के साथ शुरू हुई थी। सितंबर 2005 तक के उस दौर में, मैंने ज़मीनी स्तर पर कई सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वह जनसेवा और संघर्ष का दौर था। इसके बाद, अक्टूबर 2005 में मैं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़ा। मैं आज भी यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करता कि वैचारिक रूप से मेरा दिल हमेशा भाजपा के मूलभूत सिद्धांतों के साथ धड़कता रहा है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन जब राजनीति में 'परिवर्तन' के नाम पर नैतिक मूल्य पीछे छूटने लगें, तो चुप रहना भी एक अपराध बन जाता है। 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन धीरे-धीरे संगठन और राजनीति के भीतर एक नैतिक गिरावट दिखने...
मित्रों, आज जब मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े हिस्से की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, तब खोजी पत्रकारिता की मशाल को थामे रखना किसी बड़े साहस से कम नहीं है। अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की महिला पत्रकार ऋतिका चोपड़ा ने हाल ही में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर जो साहसिक स्टोरी की है, वह देश के सजग नागरिकों के लिए एक आंखें खोलने वाली रिपोर्ट है। ऋतिका चोपड़ा के इस जज्बे को देश का हर वो नागरिक सलाम करना चाहेगा जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है। ऋतिका ने अपनी रिपोर्ट में उन तथ्यों और तौर-तरीकों को उजागर किया है, जो अब तक चर्चाओं से दूर रखे जा रहे थे। उनकी स्टोरी से यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या संवैधानिक संस्थाएं सत्ताधारी दल के अनुकूल काम कर रही हैं ? आरोपों के घेरे में आई यह कार्यप्रणाली दर्शाती है कि निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाला आयोग कैसे अपनी स्वायत्तता खोता जा रहा है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने भी इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्टोरी को अपने मुख्य पृष्ठ (Front Page) पर जगह देकर यह साबित किय...