मित्रों, आज हमारे समाज में एक बहुत ही अजीब और दुखद चलन देखने को मिल रहा है। जब भी कोई व्यक्ति राजनीति में कदम रखता है, तो उसका सबसे पहला बयान होता है— "मैं समाज सेवा के लिए, देश की भलाई के लिए राजनीति में आ रहा हूं।" लेकिन आज का आम नागरिक यह अच्छी तरह जानता है कि इस वाक्य के पीछे कितनी बड़ी सच्चाई है और कितना बड़ा ढोंग। राजनीति के माध्यम से जनसेवा का दावा करने वाले अधिकांश लोगों के लिए यह सेवा सिर्फ एक मुखौटा है, जिसके पीछे सत्ता और पैसे की हवस छिपी होती है। सेवा के नाम पर पद और प्रतिष्ठा : इन तथाकथित समाजसेवियों का वास्तविक और इकलौता लक्ष्य किसी भी तरह किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी में कोई ऊंचा पद हासिल करना होता है। इसके बाद शुरू होती है चुनाव लड़ने के लिए टिकट पाने की होड़। जोड़-तोड़ और तिकड़म लगाकर यदि ये चुनाव जीत जाएं और विधायक या सांसद बन जाएं, तो इनका असली चरित्र सामने आता है। सोने पर सुहागा तब होता है, जब इन्हें कोई मंत्री पद हाथ लग जाता है। इसके बाद जनता की सेवा तो फाइलों में दब जाती है और शुरू होती है इनकी अपनी "मौज-मौज" और जनता को लूटने का ख...
मित्रों, मेरा यह स्पष्ट और दृढ़ मानना रहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के भव्य निर्माण की घोषणा से लेकर उसके बनने, मूर्ति स्थापना और पूजा-अर्चना तक का पूरा घटनाक्रम एक अलग ही दिशा में मुड़ चुका है। राम मंदिर, जो कि मूल रूप से एक जन-आस्था का केंद्र है और जिससे करोड़ों हिंदुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है, वह अब दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी (BJP), विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मंदिर बनकर रह गया है। मैं इसके निर्माण के समय से ही लगातार यह कहता आ रहा हूं कि यह मंदिर अब आम हिंदुओं का मंदिर या उनकी स्वतंत्र आस्था का केंद्र नहीं रहा। यह परिसर अब देश में निर्मित अनेक अन्य आधुनिक मंदिरों—जैसे अंग्रेजों के इस्कॉन (ISKCON) टेंपल या गुजराती समाज के अक्षरधाम मंदिरों की तर्ज पर—विशुद्ध रूप से संघ परिवार और भाजपा का मंदिर हो गया है, जो उनके लिए राजनीतिक और अन्य लाभ का एक जरिया साबित हो रहा है। संभव है कि कुछ लोगों या संगठनों को मेरी यह बात अप्रिय लगे, लेकिन वर्तमान का यथार्थ यही है। आज जिस तरह से अयोध्या और श्री राम मंदिर से जुड़ी खबरें सामने आ रही हैं—चाहे वे चढ़ाव...