धर्म का व्यापार और राजनीति का घालमेल; समाज और देश के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती: अभिमन्यु गुलाटी मित्रों, आज हमारे देश में धर्म का व्यापार और उसमें राजनीति का तड़का जोर-शोर से चल रहा है। यह गठजोड़ न सिर्फ फल-फूल रहा है, बल्कि समाज की जड़ों को भी कमजोर कर रहा है। वर्तमान दौर में धर्म, राजनीति और नौकरशाही का एक ऐसा ताना-बाना बन चुका है, जिसने आम जनता के विश्वास और देश के संसाधनों को गहरे संकट में डाल दिया है। धर्म के नाम पर मायाजाल: आज कोई भी धार्मिक संत, महात्मा, कथावाचक और धर्मगुरु इस विडंबना से अछूता नहीं है। जो बाबा और गुरु अपने सत्संगों और कथाओं में आम जनमानस को मोह-माया का त्याग करने का संदेश देते हैं, वे खुद इस मायाजाल में बुरी तरह फंसे हुए हैं। विरोधाभास: त्याग का उपदेश देने वाले इन गुरुओं की अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाएं हैं सादगी का पाठ पढ़ाने वाले ये आधुनिक संत आज हजारों करोड़ की संपदा के मालिक बने बैठे हैं। राजनीति और समाज सेवा का गिरता स्तर: रही बात राजनीतिज्ञों की, तो उनकी स्थिति और भी चिंताजनक है। समाज सेवा के पवित्र नाम पर राजनीति में कदम रखने वाले लोग आज दे...
मित्रों , रामायण का एक शाश्वत सत्य यह है कि सत्य और निष्ठा किसी कुल या संगठन की बपौती नहीं होते। राक्षसों के बीच रहकर भी विभीषण ने राम-नाम की लौ जलाए रखी। वे लंका के अनुशासन में तो थे, लेकिन उनका विवेक रावण के अहंकार का बंधक नहीं बना। आज के दौर में जब हम राजनीतिक और सामाजिक संगठनों, विशेषकर संघ परिवार के भीतर के परिदृश्य को देखते हैं, तो इतिहास की वह उपमा आज के 'मौन' पर बिल्कुल सटीक बैठती है। आज संगठन के भीतर ऐसे कई लोग हैं जो दिल से रामभक्त हैं—वे राम के नाम पर राजनीति नहीं, बल्कि राम के आदर्शों (त्याग, मर्यादा और करुणा) को जीते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, आज की 'चमक-दमक वाली लंका' में ये सच्चे भक्त गुमसुम हैं। उनका यह मौन डर का नहीं, बल्कि एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का है। जब सत्ता की चकाचौंध में मर्यादाओं की आहुति दी जाने लगे, तो निष्ठावान कार्यकर्ता का चुप हो जाना स्वाभाविक है। वे देख रहे हैं कि जिस राम के नाम पर जीवन समर्पित किया, आज उसी नाम को एक राजनीतिक नारे में बदला जा रहा है। आज के ये 'विभीषण' अभी चुप हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जब रावण की लंका में विभी...