"We are the party with a difference" की बात करने वालों का "चाल-चरित्र और चेहरा" 2014 के बाद सबके सामने उजागर हो गया: अभिमन्यु गुलाटी
मित्रों,
एक ज़माना ऐसा भी था जब भाजपा वाले यह कहते नहीं थकते थे कि "We are the party with a difference"!
जब वर्ष 2014 के मई माह में, पूर्ण बहुमत की सरकार इनके हाथ लगी, उसके बाद से इनका भी "चाल-चरित्र और चेहरा" सबके सामने उजागर हो गया।
इनके चेहरे से नकाब उतर गया।
अब सवाल उठता है कि हम करें भी तो क्या करें ? शायद सत्ता का चरित्र ही कुछ ऐसा है!
"Party with a difference" का नारा वाकई भाजपा की पहचान रहा है, लेकिन 2014 के बाद के सफर ने कई सवाल खड़े किए हैं।
1- आदर्श बनाम यथार्थ:
विपक्ष में रहते हुए सिद्धांत और नैतिकता की बातें करना आसान होता है, लेकिन जब पूर्ण बहुमत की सत्ता हाथ में आती है, तो 'रियल पॉलिटिक्स' (Real Politics) यानी व्यावहारिक राजनीति हावी हो जाती है।
2- सत्ता का चरित्र:
शायद सत्ता का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अंततः चेहरों पर से नकाब हटा देती है। जब संसाधनों और नियंत्रण की ताकत मिलती है, तो पुरानी पार्टियों और नई पार्टियों के बीच का अंतर धुंधला होने लगता है।
3- जनता की दुविधा:
"अब करें भी तो क्या करें?"—यह आज के जागरूक नागरिक की सबसे बड़ी व्यथा है। जब हर विकल्प अंत में एक जैसा ही दिखने लगे, तो मतदाता खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
इतिहास गवाह है कि पूर्ण बहुमत कभी-कभी जवाबदेही को कम कर देता है, जिससे वह 'चाल-चरित्र' बदल जाता है जिसके दम पर वोट मांगे गए थे।