सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जुलाई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जंतर-मंतर.....और युवा शक्ति की हुंकार

मित्रों, दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर, जो कभी ग्रहों की गति और समय के चक्र को मापने के लिए वैज्ञानिक सटीकता का प्रतीक बना था, आज देश की राजनीतिक दिशा और दशा का थर्मामीटर बन चुका है।  हाल ही में देशभर से एकत्रित हुए हजारों युवाओं, विभिन्न विचारधाराओं के विचारकों और जननेताओं के महासंगम ने एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है।  इस अभूतपूर्व एकजुटता ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग भले ही अपनी मर्जी से नीतियां चला रहे हों, लेकिन समय और जनता के इरादों का चक्र अब मोदी सरकार के पक्ष में नहीं घूम रहा है। 1. वैज्ञानिक प्रतीक और राजनीतिक यथार्थ जंतर-मंतर की वेधशाला (Observatory) हमें सिखाती है कि प्रकृति में कुछ भी स्थायी नहीं है—समय बदलता है और ग्रहों की चाल भी बदलती है।  आज इस ऐतिहासिक स्थल से उठी आवाज इस बात का साक्ष्य है कि राजनीतिक बदलाव की बयार चल पड़ी है। जब देश की युवा शक्ति सड़कों पर उतरती है, तो वह केवल विरोध नहीं करती, बल्कि सत्ता के अहंकार को चुनौती देकर समय का रुख बदलने का माद्दा रखती है। 2. तानाशाही रवैये और मनमानियों के खिलाफ एकजुटता लोकतंत्र संवा...
धर्म का व्यापार और राजनीति का घालमेल; समाज और देश के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती:  अभिमन्यु गुलाटी मित्रों, आज हमारे देश में धर्म का व्यापार और उसमें राजनीति का तड़का जोर-शोर से चल रहा है। यह गठजोड़ न सिर्फ फल-फूल रहा है, बल्कि समाज की जड़ों को भी कमजोर कर रहा है। वर्तमान दौर में धर्म, राजनीति और नौकरशाही का एक ऐसा ताना-बाना बन चुका है, जिसने आम जनता के विश्वास और देश के संसाधनों को गहरे संकट में डाल दिया है। धर्म के नाम पर मायाजाल: आज कोई भी धार्मिक संत, महात्मा, कथावाचक और धर्मगुरु इस विडंबना से अछूता नहीं है। जो बाबा और गुरु अपने सत्संगों और कथाओं में आम जनमानस को मोह-माया का त्याग करने का संदेश देते हैं, वे खुद इस मायाजाल में बुरी तरह फंसे हुए हैं। विरोधाभास: त्याग का उपदेश देने वाले इन गुरुओं की अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाएं हैं सादगी का पाठ पढ़ाने वाले ये आधुनिक संत आज हजारों करोड़ की संपदा के मालिक बने बैठे हैं। राजनीति और समाज सेवा का गिरता स्तर: रही बात राजनीतिज्ञों की, तो उनकी स्थिति और भी चिंताजनक है। समाज सेवा के पवित्र नाम पर राजनीति में कदम रखने वाले लोग आज दे...

आधुनिक लंका और मौन के 'विभीषण' - अभिमन्यु गुलाटी

मित्रों , रामायण का एक शाश्वत सत्य यह है कि सत्य और निष्ठा किसी कुल या संगठन की बपौती नहीं होते।  राक्षसों के बीच रहकर भी विभीषण ने राम-नाम की लौ जलाए रखी। वे लंका के अनुशासन में तो थे, लेकिन उनका विवेक रावण के अहंकार का बंधक नहीं बना।  आज के दौर में जब हम राजनीतिक और सामाजिक संगठनों, विशेषकर संघ परिवार के भीतर के परिदृश्य को देखते हैं, तो इतिहास की वह उपमा आज के 'मौन' पर बिल्कुल सटीक बैठती है। आज संगठन के भीतर ऐसे कई लोग हैं जो दिल से रामभक्त हैं—वे राम के नाम पर राजनीति नहीं, बल्कि राम के आदर्शों (त्याग, मर्यादा और करुणा) को जीते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, आज की 'चमक-दमक वाली लंका' में ये सच्चे भक्त गुमसुम हैं। उनका यह मौन डर का नहीं, बल्कि एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का है।  जब सत्ता की चकाचौंध में मर्यादाओं की आहुति दी जाने लगे, तो निष्ठावान कार्यकर्ता का चुप हो जाना स्वाभाविक है। वे देख रहे हैं कि जिस राम के नाम पर जीवन समर्पित किया, आज उसी नाम को एक राजनीतिक नारे में बदला जा रहा है।  आज के ये 'विभीषण' अभी चुप हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जब रावण की लंका में विभी...

समाज सेवा का मुखौटा और राजनीति का स्याह सच: क्या इस गंदगी का कोई इलाज है ? अभिमन्यु गुलाटी

मित्रों,    आज हमारे समाज में एक बहुत ही अजीब और दुखद चलन देखने को मिल रहा है। जब भी कोई व्यक्ति राजनीति में कदम रखता है, तो उसका सबसे पहला बयान होता है— "मैं समाज सेवा के लिए, देश की भलाई के लिए राजनीति में आ रहा हूं।"   लेकिन आज का आम नागरिक यह अच्छी तरह जानता है कि इस वाक्य के पीछे कितनी बड़ी सच्चाई है और कितना बड़ा ढोंग।  राजनीति के माध्यम से जनसेवा का दावा करने वाले अधिकांश लोगों के लिए यह सेवा सिर्फ एक मुखौटा है, जिसके पीछे सत्ता और पैसे की हवस छिपी होती है। सेवा के नाम पर पद और प्रतिष्ठा : इन तथाकथित समाजसेवियों का वास्तविक और इकलौता लक्ष्य किसी भी तरह किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी में कोई ऊंचा पद हासिल करना होता है।  इसके बाद शुरू होती है चुनाव लड़ने के लिए टिकट पाने की होड़। जोड़-तोड़ और तिकड़म लगाकर यदि ये चुनाव जीत जाएं और विधायक या सांसद बन जाएं, तो इनका असली चरित्र सामने आता है।  सोने पर सुहागा तब होता है, जब इन्हें कोई मंत्री पद हाथ लग जाता है। इसके बाद जनता की सेवा तो फाइलों में दब जाती है और शुरू होती है इनकी अपनी "मौज-मौज" और जनता को लूटने का ख...