मित्रों, रामायण का एक शाश्वत सत्य यह है कि सत्य और निष्ठा किसी कुल या संगठन की बपौती नहीं होते।
राक्षसों के बीच रहकर भी विभीषण ने राम-नाम की लौ जलाए रखी। वे लंका के अनुशासन में तो थे, लेकिन उनका विवेक रावण के अहंकार का बंधक नहीं बना।
आज के दौर में जब हम राजनीतिक और सामाजिक संगठनों, विशेषकर संघ परिवार के भीतर के परिदृश्य को देखते हैं, तो इतिहास की वह उपमा आज के 'मौन' पर बिल्कुल सटीक बैठती है।
आज संगठन के भीतर ऐसे कई लोग हैं जो दिल से रामभक्त हैं—वे राम के नाम पर राजनीति नहीं, बल्कि राम के आदर्शों (त्याग, मर्यादा और करुणा) को जीते हैं।
लेकिन विडंबना देखिए, आज की 'चमक-दमक वाली लंका' में ये सच्चे भक्त गुमसुम हैं। उनका यह मौन डर का नहीं, बल्कि एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का है।
जब सत्ता की चकाचौंध में मर्यादाओं की आहुति दी जाने लगे, तो निष्ठावान कार्यकर्ता का चुप हो जाना स्वाभाविक है। वे देख रहे हैं कि जिस राम के नाम पर जीवन समर्पित किया, आज उसी नाम को एक राजनीतिक नारे में बदला जा रहा है।
आज के ये 'विभीषण' अभी चुप हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जब रावण की लंका में विभीषण सच बोलता था, तो उसे लात मारकर बाहर कर दिया जाता था।
आज के दौर में लात तो नहीं पड़ती, लेकिन 'मार्गदर्शक मंडल' या 'अदृश्य कोने' में धकेल दिया जाता है। यह मौन असल में एक खामोश विरोध है, जो आने वाले समय में बड़े बदलाव का संकेत दे सकता है।