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समाज सेवा का मुखौटा और राजनीति का स्याह सच: क्या इस गंदगी का कोई इलाज है ? अभिमन्यु गुलाटी

मित्रों,  
आज हमारे समाज में एक बहुत ही अजीब और दुखद चलन देखने को मिल रहा है। जब भी कोई व्यक्ति राजनीति में कदम रखता है, तो उसका सबसे पहला बयान होता है—"मैं समाज सेवा के लिए, देश की भलाई के लिए राजनीति में आ रहा हूं।" 

लेकिन आज का आम नागरिक यह अच्छी तरह जानता है कि इस वाक्य के पीछे कितनी बड़ी सच्चाई है और कितना बड़ा ढोंग। 

राजनीति के माध्यम से जनसेवा का दावा करने वाले अधिकांश लोगों के लिए यह सेवा सिर्फ एक मुखौटा है, जिसके पीछे सत्ता और पैसे की हवस छिपी होती है।

सेवा के नाम पर पद और प्रतिष्ठा :
इन तथाकथित समाजसेवियों का वास्तविक और इकलौता लक्ष्य किसी भी तरह किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी में कोई ऊंचा पद हासिल करना होता है। 

इसके बाद शुरू होती है चुनाव लड़ने के लिए टिकट पाने की होड़। जोड़-तोड़ और तिकड़म लगाकर यदि ये चुनाव जीत जाएं और विधायक या सांसद बन जाएं, तो इनका असली चरित्र सामने आता है। 

सोने पर सुहागा तब होता है, जब इन्हें कोई मंत्री पद हाथ लग जाता है। इसके बाद जनता की सेवा तो फाइलों में दब जाती है और शुरू होती है इनकी अपनी "मौज-मौज" और जनता को लूटने का खुला खेल।

विकास के नाम पर ब्लैकमेलिंग और 40% कमीशन का खेल
इन नेताओं और उनके गुर्गों का मुख्य काम अब मोहल्लों, शहरों और नगरों में हो रहे विकास कार्यों पर गिद्ध दृष्टि रखना बन गया है। 

जहां भी कोई नई फैक्ट्री, मकान, शॉपिंग मॉल या अन्य निर्माण कार्य शुरू होता है, ये लोग वहां पहुंच जाते हैं। इनका मकसद निर्माण को सुचारू रूप से चलाना नहीं, बल्कि वहां के मालिकों को कानूनी या गैर-कानूनी अड़चनों का डर दिखाकर ब्लैकमेल करना और मोटी रकम वसूलना होता है।

इसके अलावा, सरकारी ठेके लेना या अपने चहेतों को दिलवाना इनका बड़ा व्यापार है। इन सरकारी प्रोजेक्ट्स में बेहद घटिया दर्जे की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इसमें 40% से भी अधिक का मोटा कमीशन ऊपर से नीचे तक बंटता है।

जनता के टैक्स के पैसे से बनी सड़कें पहली ही बारिश में बह जाती हैं, लेकिन इन नेताओं की जेबें हमेशा भरी रहती हैं।

जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं :
बड़ा दुख और क्षोभ होता है यह देखकर कि जो लोग समाज सेवा का नकाब ओढ़कर सत्ता के गलियारों तक पहुंचते हैं, वे ही सबसे पहले जनता की पीठ में छुरा घोंपते हैं। 

आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि सभी राजनीतिक दल खुद को दूध का धुला और साफ-सुथरा बताते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह भ्रष्टाचार की गंदगी हर दल में पूरी तरह फैल चुकी है। सभी इस हमाम में नंगे हैं। 

सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं, आज 'समाज सेवा' के नाम पर आवारागर्दी करने वाले और एनजीओ (NGO) बनाकर सरकार से पैसा ऐंठने वाले गिरोह भी सक्रिय हैं।

 समाज सेवा अब दिल से की जाने वाली सेवा नहीं, बल्कि पैसा कमाने और रुतबा हासिल करने का एक संगठित धंधा बन चुकी है।

क्या इस लाइलाज बीमारी का कोई इलाज है ?
इस चौतरफा फैली गंदगी को देखकर आम नागरिक असहाय महसूस करता है। ऐसा लगता है जैसे इस व्यवस्था का कोई इलाज ही नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस धोखे को यूं ही सहते रहेंगे ? क्या एक जागरूक समाज के रूप में हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है ?

इस गंदगी को दूर करने की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी:
  1. वोट की कीमत समझें: जब तक जनता मुफ्त के प्रलोभनों (फ्रीबीज), जाति, धर्म और खोखले वादों के आधार पर वोट देती रहेगी, तब तक यह लूट का बाजार गर्म रहेगा। हमें उम्मीदवार का चरित्र और उसका ट्रैक रिकॉर्ड देखना होगा ।
  2. सवालों की ताकत: हमें अपने स्थानीय नेताओं से विकास कार्यों, बजट और भ्रष्टाचार पर सीधे सवाल पूछने होंगे।
  3. तकनीक और आरटीआई का उपयोग: सूचना के अधिकार (RTI) और सोशल मीडिया जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर हर गलत काम और घटिया निर्माण के खिलाफ आवाज उठानी होगी।
व्यवस्था तब तक नहीं सुधरेगी, जब तक भ्रष्ट लोगों के मन में यह डर नहीं होगा कि सामने खड़ी जनता अब अज्ञानी नहीं, बल्कि जागरूक और संगठित है। बदलाव की शुरुआत हमारे अपने एक वोट और एक सवाल से होगी।

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