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आस्था, अधिकार और वर्चस्व की नई अयोध्या— अभिमन्यु गुलाटी

मित्रों, मेरा यह स्पष्ट और दृढ़ मानना रहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के भव्य निर्माण की घोषणा से लेकर उसके बनने, मूर्ति स्थापना और पूजा-अर्चना तक का पूरा घटनाक्रम एक अलग ही दिशा में मुड़ चुका है।

राम मंदिर, जो कि मूल रूप से एक जन-आस्था का केंद्र है और जिससे करोड़ों हिंदुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है, वह अब दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी (BJP), विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मंदिर बनकर रह गया है।

मैं इसके निर्माण के समय से ही लगातार यह कहता आ रहा हूं कि यह मंदिर अब आम हिंदुओं का मंदिर या उनकी स्वतंत्र आस्था का केंद्र नहीं रहा।

यह परिसर अब देश में निर्मित अनेक अन्य आधुनिक मंदिरों—जैसे अंग्रेजों के इस्कॉन (ISKCON) टेंपल या गुजराती समाज के अक्षरधाम मंदिरों की तर्ज पर—विशुद्ध रूप से संघ परिवार और भाजपा का मंदिर हो गया है, जो उनके लिए राजनीतिक और अन्य लाभ का एक जरिया साबित हो रहा है। 

संभव है कि कुछ लोगों या संगठनों को मेरी यह बात अप्रिय लगे, लेकिन वर्तमान का यथार्थ यही है।

आज जिस तरह से अयोध्या और श्री राम मंदिर से जुड़ी खबरें सामने आ रही हैं—चाहे वे चढ़ावे के प्रबंधन पर उठते सवाल हों, स्थानीय स्तर पर कथित अनियमितताएं हों या जमीन के लेन-देन से जुड़े विवाद हों—वे सभी मेरी इसी बात को बल प्रदान करती हैं।

 स्थिति अब यह हो चुकी है कि अयोध्या स्थित प्रभु श्री राम के मंदिर पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए खुद संघ परिवार और भाजपा के भीतर भी वर्चस्व की एक मूक लड़ाई चल रही है। जन-आस्था के इस आधुनिक स्वरूप को लेकर यह मेरा अपना मौलिक और स्पष्ट मत है।

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