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खोती गरिमा के बीच पत्रकारिता का साहस और चुनाव आयोग की साख पर सवाल: अभिमन्यु गुलाटी

मित्रों, आज जब मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े हिस्से की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, तब खोजी पत्रकारिता की मशाल को थामे रखना किसी बड़े साहस से कम नहीं है।

अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की महिला पत्रकार ऋतिका चोपड़ा ने हाल ही में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर जो साहसिक स्टोरी की है, वह देश के सजग नागरिकों के लिए एक आंखें खोलने वाली रिपोर्ट है। 

ऋतिका चोपड़ा के इस जज्बे को देश का हर वो नागरिक सलाम करना चाहेगा जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है।

ऋतिका ने अपनी रिपोर्ट में उन तथ्यों और तौर-तरीकों को उजागर किया है, जो अब तक चर्चाओं से दूर रखे जा रहे थे। उनकी स्टोरी से यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या संवैधानिक संस्थाएं सत्ताधारी दल के अनुकूल काम कर रही हैं ?

आरोपों के घेरे में आई यह कार्यप्रणाली दर्शाती है कि निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाला आयोग कैसे अपनी स्वायत्तता खोता जा रहा है। 

'द इंडियन एक्सप्रेस' ने भी इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्टोरी को अपने मुख्य पृष्ठ (Front Page) पर जगह देकर यह साबित किया है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका अभी जिंदा है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही भारतीय चुनाव आयोग है जिसे टी. एन. शेषन (T.N. Seshan) जैसे कड़क और ईमानदार मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की थी। 

उनके कार्यकाल में बड़े-बड़े राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता भी आदर्श आचार संहिता और नियमों के उल्लंघन से कांपते थे। उन्होंने चुनाव आयोग को एक रीढ़ दी थी। 

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