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अपने समय के Gen-Z शहीद-ए-आज़म भगतसिंह, अशफाक उल्ला खां, जिनके भीतर राष्ट्रभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था।

Gen-Z

14 से 29 वर्ष की आयु के नौजवान

मित्रों,
आइये आपको अब मिलवाते हैं देश की आज़ादी की लड़ाई स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में हंसते हंसते अपने प्राणों को बलिवेदी पर चढ़ा देने वाले उस समय के Gen-Z से।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे युवा नायकों की वीरगाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी 14 से 29 वर्ष की आयु में देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण हंसते-हंसते न्योछावर कर दिए। 

यदि हम आज की भाषा में कहें, तो वे अपने समय के Gen-Z (युवा पीढ़ी) थे, जिनके भीतर राष्ट्रभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था।

यहाँ स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ सबसे प्रमुख युवा क्रांतिकारियों की सूची दी गई है, जिन्होंने बेहद कम उम्र में इतिहास रच दिया:

क्रांतिकारी का नाम शहादत / बलिदान के समय आयु मुख्य योगदान और वीरता की कहानी....

खुदीराम बोस 18 वर्ष भारत के सबसे युवा शहीदों में से एक। मुजफ्फरपुर के अत्याचारी जज किंग्सफोर्ड पर बम फेंकने के आरोप में उन्हें 11 अगस्त 1908 को फांसी दे दी गई थी। फांसी के फंदे को चूमते समय उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

करतार सिंह सराभा 19 वर्ष गदर पार्टी के प्रमुख नेता, जिन्होंने विदेशों में रहकर भारत की आज़ादी की रणनीति बनाई। नवंबर 1915 में लाहौर साजिश केस में उन्हें फांसी दी गई। शहीद भगत सिंह उन्हें अपना गुरु और आदर्श मानते थे।

शहीद भगत सिंह 23 वर्ष देश के युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत। लाहौर षड्यंत्र और असेंबली बम कांड के बाद 23 मार्च 1931 को उन्हें सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी दे दी गई। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा उन्होंने घर-घर पहुँचाया।

सुखदेव थापर 23 वर्ष हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख रणनीतिकार। भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लाहौर में क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्व किया और 23 मार्च 1931 को वीरगति पाई।

शिवराम राजगुरु 22 वर्ष महान निशानेबाज और चंद्रशेखर आज़ाद के करीबी साथी। ब्रिटिश अधिकारी सॉन्डर्स के वध में मुख्य भूमिका निभाई और हंसते-हंसते भगत सिंह व सुखदेव के साथ फांसी के फंदे पर झूल गए।

चंद्रशेखर आज़ाद 24 वर्ष "आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे" की कसम खाने वाले महानायक। अल्फ्रेड पार्क (प्रयागराज) में पुलिस से घिर जाने पर उन्होंने आखिरी गोली खुद को मारकर देश के लिए अपनी शहादत दे दी।

कनकलता बरुआ 17 वर्ष असम की वीर बाला, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोलियों की परवाह न करते हुए कोर्ट भवन पर तिरंगा फहराने का प्रयास किया और देश के लिए शहीद हो गईं।

राम प्रसाद बिस्मिल 30 वर्ष (लगभग) काकोरी ट्रेन एक्शन के मास्टरमाइंड, जिन्होंने "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" जैसी अमर रचनाओं से युवाओं में जोश भरा। 1927 में उन्हें गोरखपुर जेल में फांसी दी गई।

अशफाक उल्ला खान 27 वर्ष राम प्रसाद बिस्मिल के जिगरी दोस्त और काकोरी कांड के प्रमुख नायक। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की और मुस्कुराते हुए देश के लिए फांसी के फंदे को गले लगा लिया।

इन युवा क्रांतिकारियों ने साबित किया कि देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना उम्र की मोहताज नहीं होती। आज के युवाओं के लिए इनका जीवन और बलिदान सबसे बड़ा आदर्श है।

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