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सत्ता से सवाल, दमन और ऐतिहासिक समानताएं : अभिमन्यु गुलाटी

मित्रों, आज देश की राजधानी दिल्ली में लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और चुनावी निष्पक्षता के लिए उठने वाली आवाज़ों को प्रशासनिक शक्ति के बल पर दबाने का प्रयास किया जा रहा है। 

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के युवा नेता सौरभ दास, आशुतोष रांका, अभिजीत दिपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा जैसे कार्यकर्ताओं को सिर्फ इसलिए पुलिसिया दमन और हिरासत का शिकार होना पड़ रहा है, क्योंकि वे सरकार से तीखे सवाल पूछ रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

नेताओं की इस कथित प्रताड़ना और गिरफ्तारी के खिलाफ जब युवाओं ने 'लहरा दो तिरंगा' मार्च (Tricolour March) का शांतिपूर्ण आह्वान किया, तो नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (NDMC) द्वारा दिल्ली के कनॉट प्लेस और सेंट्रल पार्क को दो दिनों के लिए बंद कर छावनी में बदल दिया गया। 

इसके बावजूद, सैकड़ों छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने हाथ में तिरंगा लेकर इस ऐतिहासिक मार्च को आगे बढ़ाया।

मंडी हाउस से लेकर कनॉट प्लेस तक युवाओं की आवाज़ गूंजी, जिसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (निषेधाज्ञा) का हवाला देकर अभिजीत दिपके सहित कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। 

यह दमनकारी स्थिति हमें भारत के गौरवशाली इतिहास के उस दौर की याद दिलाती है, जब देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे क्रांतिकारियों को भी इसी तरह के जुल्मों का सामना करना पड़ा था।

अतीत और वर्तमान की तुलनात्मक रूपरेखा

पैमानाऐतिहासिक दौर (ब्रिटिश काल)वर्तमान दौर (लोकतांत्रिक भारत)
प्रमुख नेतृत्वकर्ताभगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद एवं अन्य क्रांतिकारीसौरभ दास, आशुतोष रांका, अभिजीत दिपके, नेहा बोरा
विरोध का कारणविदेशी हुकूमत की गुलामी और दमनकारी नीतियों के खिलाफ पूर्ण स्वतंत्रता की जंगचुनाव आयुक्त का इस्तीफा, चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग
आंदोलन का स्वरूपअसेंबली में बम (बिना किसी को नुकसान पहुंचाए) और सशस्त्र क्रांति'लहरा दो तिरंगा' मार्च, जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह
सत्ता का रवैयाब्रिटिश पुलिस द्वारा क्रांतिकारियों को 'आतंकवादी' और 'सिरफिरा' घोषित करना।दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर धारा 163 लगाना, हिरासत में लेना और जेल भेजना।
कष्ट और संघर्षसालों तक जेल की बर्बर यातनाएं, सामाजिक अपमान और अंततः हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमना।

शांतिपूर्ण मार्च के दौरान जबरन हिरासत, तिहाड़ जेल भेजना और मानसिक उत्पीड़न।
वैचारिक निष्कर्ष
इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता निरंकुश होने का प्रयास करती है, तब-तब उसके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले देशप्रेमी युवाओं को अपमान, प्रताड़ना और कष्टों से गुज़रना पड़ता है।

औपनिवेशिक दौर में जिन गोरों की पुलिस ने हमारे महान क्रांतिकारियों को अपराधी और बागी ठहराया था, आज उसी तर्ज पर व्यवस्था से निष्पक्षता का सवाल पूछने वाले युवाओं को दबाया जा रहा है।

तिरंगे को हाथ में लेकर चलना और अपने मताधिकार की रक्षा की मांग करना कोई अपराध नहीं है। 

परंतु, इतिहास का सबसे बड़ा सच यही है कि दमनकारी नीतियां कभी भी सच और हक की आवाज़ को हमेशा के लिए दबा नहीं सकतीं। 

कल भी हुकूमत के आगे युवाओं का संघर्ष भारी पड़ा था, और आज भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़ रहे इन युवाओं का हौसला ही अंतिम विजय तय करेगा।









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